मुख्य संसदीय सचिव मामले में सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में राज्य सरकार

हिमाचल: मुख्य संसदीय सचिव मामले में सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में राज्य सरकार
हिमाचल हाईकोर्ट ने बीते दिनों ही इस मामले को लेकर राज्य सरकार के आवेदन को खारिज किया है। संभावित है कि सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ कांग्रेस नेता और अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी सरकार की पैरवी करेंगे।
मुख्य संसदीय सचिव मामले को लेकर हिमाचल प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है। प्रदेश सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर करने की योजना है। हिमाचल हाईकोर्ट ने बीते दिनों ही इस मामले को लेकर राज्य सरकार के आवेदन को खारिज किया है। संभावित है कि सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ कांग्रेस नेता और अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी सरकार की पैरवी करेंगे। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने उपमुख्यमंत्री व मुख्य संसदीय सचिवों (सीपीएस) की नियुक्तियों के मामले में राज्य सरकार के आवेदन को खारिज किया है। सरकार ने याचिकाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठाया था। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि उपमुख्यमंत्री समेत सीपीएस की नियुक्तियों को चुनौती देने वाली याचिका में कोई दोष नहीं है। यदि कोई दोष था तो उसे अतिरिक्त शपथपत्र दायर कर दूर कर दिया गया है।
अदालत ने कहा कि याचिका की अनियमितता को सुधारा जा सकता है। सीपीएस की नियुक्तियों को चुनौती देने वाली याचिकाएं अवैध नहीं हैं, जिन्हें खारिज किया जा सके। 16 अक्तूबर को इस मामले की आगामी सुनवाई निर्धारित की गई है। बता दें कि सीपीएस की नियुक्तियों को तीन याचिकाओं के माध्यम से चुनौती दी गई है। सबसे पहले वर्ष 2016 में पीपल फॉर रिस्पांसिबल गवर्नेंस संस्था ने सीपीएस को चुनौती दी थी। नई सरकार की ओर से सीपीएस की नियुक्ति किए जाने पर उन्हें प्रतिवादी बनाए जाने के लिए आवेदन किया गया। इसके बाद मंडी निवासी कल्पना देवी ने भी सीपीएस की नियुक्तियों को लेकर याचिका दायर की है। भाजपा नेता सतपाल सत्ती ने उपमुख्यमंत्री समेत सीपीएस की नियुक्तियों को चुनौती दी है। अदालत सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई कर रही है।
यह है मामला
अर्की विधानसभा क्षेत्र से सीपीएस संजय अवस्थी, कुल्लू से सुंदर सिंह, दून से राम कुमार, रोहड़ू से मोहन लाल ब्राक्टा, पालमपुर से आशीष बुटेल और बैजनाथ से किशोरी लाल की नियुक्ति को चुनौती दी गई है। याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि पंजाब में भी ऐसी नियुक्तियां की गई थीं, जिन्हें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने इन नियुक्तियों को असांविधानिक ठहराया था। इसके अलावा असम और मणिपुर में भी इस मामले को लेकर पूर्व में फैसला सुनाया जा चुका है और सर्वोच्च न्यायालय मानता है कि उनकी नियुक्ति असंवैधानिक है।